खड़े हैं साथ किसी के ना वफ़ा ना इश्क़
बंधे हुए हैं लोग ज़माने भर की जंजीरों से
इस दफ़ा मैंने सोचा भी कि बात बदली जाए
लेकिन वो टला ही नहीं पुरानी तक़रीरों से
झूठ बोलने का न दिल था न मकसद था
आड़ लेनी थी उसके सवालों के तीरों से
कर के भी क्या हासिल हुआ अब तक मुझको
और क्या मिला है हाथ की लकीरों से
पूरा बाज़ार अकेले उन्होंने ख़रीद लिया
आप कहते रहे दौलत हारी है ज़मीरों से
अब इस नुमाइश में भी रखा क्या है
रंग उतरने लगे हैं पुरानी तस्वीरों से


