क्या पूछूँ तुमसे?
होगे तुम शायद कहीं
ढेरों लोगों के
शोर-शराबे और भीड़-भाड़ के बीच,
आते और जाते
हर दिन,
व्यस्तता की गंभीरता
चेहरे पर चिपकाए,
अपने स्वार्थ को खाद पानी देते हुए,
मानो तुम किसी दीवार पर
कोई छिपकली हो।
क्या पूछूँ तुमसे कि
क्या तुमने इस बारिश
किसी जंग खाती खिड़की
को खींचकर खोला
और बाहर
झाँककर देखा?
बारिश की बूंदों का पत्तों पर टपकना
और ज़मीन पर लुढ़क कर
नन्हे तालाबों पर तैर जाना —
तुमने देखा?
अपने हाथ पसार कर उन्हें छुआ?
तुम्हारे छिपकलीनुमा चेहरे पर
शायद एक मुस्कान तैर गई हो?


