मोहन राकेश और उनकी कहानियाँ
हिंदी के सर्वश्रेष्ठ कहानीकारों में से एक मोहन राकेश की कहानियों में बीते हुए युग की कसमसाहट और आने वाले युग की आहट दोनों मौजूद हैं
मोहन राकेश की कृतियों से मेरा पहला परिचय दसवीं या ग्यारहवीं कक्षा की हिन्दी की पाठ्य पुस्तक में उनके लिखे एक यात्रा वृत्तांत से हुआ जिसमे उन्होंने अपनी कन्याकुमारी की यात्रा का चित्रण किया है। पढ़ने का चाव मुझे उस वक़्त भी था लेकिन जो साहित्य मुझे उपलब्ध था वह ज़्यादातर पाठ्य पुस्तकों में दिए निबंध, कहानी, कविता, और नाटक तक ही सीमित था। मुझे याद है कि पढ़ने की ललक मेरी इस क़दर थी कि मैंने बारहवीं की लघु कथाओं की किताब सैकड़ो बार पढ़ी होगी जिसमें ‘पंचलाइट’ और ‘कर्मनाशा की हार’ सरीखी मंत्रमुग्ध कर देने वाली कहानियाँ थीं। आमतौर हिंदी गद्य की किताब के निबंध बहुत ही झिलाऊ और उपदेशात्मक होते थे जिनमें मेरा कोई रस नहीं था, लेकिन उसी किताब में मोहन राकेश का वह यात्रा वृत्तान्त भी था जिसमे उन्होंने कन्याकुमारी के समुद्र तट के दृश्यों, विवेकानंद चट्टान तक जाने और लौट कर आने और इस बीच जिन लोगों को उन्होंने देखा, उन सबका ऐसा सजीव वर्णन किया जिसे पढ़कर मुझे पहली बार लगा कि ये ऐसे भी लिखा जा सकता है। उनके लेखन में मुझे एक संजीदगी, भावुकता और आधुनिक शैली दिखी जो उन किताबों में मौजूद कई अन्य लेखकों के बोझिल आदर्शवाद से बिल्कुल हटकर थी। जिस बिंदु पर वह यात्रा वृत्तांत ख़त्म हुआ, जहाँ लेखक जलती बुझती रौशनियाँ देख रहा है और फेरीवाले की आवाज़ें सुन रहा है, उस समय मेरे किशोर मन को विस्मित कर गया।
कई दशकों बाद हाल ही में मेरे हाथ में जब उनकी सम्पूर्ण कहानियों का संकलन आया (आईआईएम लखनऊ के पुस्तकालय के छोटे से हिन्दी अनुभाग का आभार), तो मैंने कुछ ही दिन (और रात) में उनकी सारी कहानियाँ पढ़ डालीं। फिर मौक़ा मिले ना मिले। मोहन राकेश का जन्म 1925 में हुआ और 1972 में केवल 47 साल की अल्पायु में उनकी मृत्यु हो गई (ये मुझे आज भी याद था क्यूँकि उत्तर प्रदेश बोर्ड के हिंदी विषय के शिक्षकों को साहित्य की विधा से भले घंटा मतलब न हो, उन्हें विद्यार्थियों से लेखकों और कवियों की जीवनी रटने और कापी पर उलट देने की प्रतिभा की अपेक्षा सर्वदा रहती थी)। मोहन राकेश ने जिस युग को जिया उसे ही अपनी 66 कहानियों में विविध पृष्ठभूमि के किरदारों और उनके जीवन के एक हिस्से की झलकों के माध्यम से सजीव किया। ‘झलक’ शब्द कहानियों के लिए महत्वपूर्ण है।
अंग्रेज़ी के बेहतरीन कहानी लेखक रेमंड कार्वर ने एक निबन्ध में वी एस प्रिचेट को उद्धृत करते हुए लिखा:
Definition of a short story is “something glimpsed from the corner of the eye, in passing.” Notice the “glimpse” part of this. First the glimpse. Then the glimpse given life, turned into something that illuminates the moment and may, if we’re lucky—that word again—have even further-ranging consequences and meaning.
तो कहानियों में किरदारों की हमें केवल झलक ही मिलती है। जैसे किसी फ़िल्म का एक हिस्सा बीच से चला कर बीच में ही ख़त्म कर दिया जाए, कुछ वैसा। पाठक के तौर पर कहानी के पात्रों से हमारा परिचय उतना ही सीमित होता है जितने थोड़े पन्नों में लेखक ने काग़ज़ पर उन पात्रों को उकेरा है। जैसे किसी चलती ट्रेन में आप किसी से मिले और फिर कभी नहीं। लेकिन उस झलक से आप किसी समय, किसी व्यक्ति, किसी परिस्थिति, किसी द्वंद्व के बारे कुछ जान पाते हैं, या फिर अनुमान लगा सकते हैं। और राकेश की कहानियों में भी वैसा ही कुछ है।
2026 में मोहन राकेश की कहानियों को पढ़ते समय जो पहली अनुभूति होती है, वह है नयेपन की जो कि अपने आप में बहुत ही अनूठी बात है। कैसे? इतनी पुरानी कहानियाँ इतनी ताज़ा कैसे लग सकती हैं? स्वाभाविक रूप से इन कहानियों में उस समय (1947-1969) के समाज की पृष्ठभूमि में ही पात्र गढ़ें गए हैं लेकिन वे फिर भी बेहद रोचक और सामयिक लगते हैं। वे बोर होते हैं, कमरे में चहलकदमी करते हैं, सिगरेट पीते हैं, उधार लेते हैं, ताश खेलते हैं, होटल में बियर पीते हैं। जिस परिवेश में वे रहते हैं — घर, मोहल्ला, दफ़्तर — वह भी आज से बहुत अलग नहीं लगता। मिसाल के तौर पर ‘मिस पाल’ नाम की कहानी में अपने सरकारी दफ्तर के सहकर्मियों के बारे में ‘मिस पाल’ की ये राय :
“ये लोग इतने ओछे और बेईमान हैं, “ वह कहा करती, “इतनी छोटी और कमीनी बातें करते हैं कि मेरा इनके बीच काम करते हर वक्त दम घुटता रहता है। जाने क्यों ये लोग इतनी छोटी-छोटी बातों पर एक-दूसरे से लड़ते हैं और अपने छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए एक-दूसरे को कुचलने की कोशिश करते रहते हैं”
या फिर ‘मिस पाल’ का अपने जीवन के दोहराव को लेकर ये ख़याल:
मुझे लगता है, मैं खामखाह यहाँ अपनी ज़िन्दगी बरबाद कर रही हूँ। मेरी समझ में नहीं आता कि इस तरह की ज़िन्दगी जीने का आखिर मतलब ही क्या है? सुबह उठती हूँ, दफ़्तर चली जाती हूँ। वहाँ सात-आठ घण्टे खराब करके घर आती हूँ, खाना खाती हूँ और सो जाती हूँ। यह सारा-का-सारा सिलसिला मुझे बिलकुल बेमानी लगता है। मैं सोचती हूँ कि मेरी ज़रूरतें ही कितनी हैं ? मैं कहीं भी जाकर एक छोटा-सा कमरा या शैक लूँ तो थोड़ा-सा ज़रूरत का सामान अपने पास रखकर पचास-साठ या सौ रुपये में गुजारा कर सकती हूँ।
पचास-साठ या सौ रुपये में गुजारा करने की बात बताती है कि कहानी किस दौर में लिखी गई होगी, लेकिन समाज के सिकुड़े हुए दायरों में व्यक्ति की अर्थ की तलाश तो आज भी वही है। राकेश के शहरी किरदार तो मुझे अपने देखे हुए से लगते हैं।
‘खाली’ कहानी है ‘तोषी’ नामक एक गृहिणी की जो अपने पति ‘जुगल’ के दफ़्तर और बच्ची ‘बेबी’ के स्कूल चले जाने के बाद घर में अकेली है और अकेली होने पर भी वो अकेली नहीं है। ‘जुगल’ जैसे ना होकर भी है। उसकी हर बात, हर अंदाज़, चेहरे के हाव भाव, रोज़मर्रा की आदतें ‘तोषी’ को याद आते रहते हैं।
जुगल घर पर नहीं था, पर उसका ‘होना’ उसके बाहर रहने पर भी उसी तरह महसूस होता था जैसे घर पर रहने पर। उसकी साड़ी की निचाई और ब्लाउज़ की ऊँचाई-इन पर जुगल की नज़र हर वक्त रहती थी। शुक्र था नहाते वक्त वह गुसलखाने में उसके साथ नहीं होता। रात को बिस्तर में साथ होता था, तो उस वक्त बत्तियाँ बुझी रहती थीं। वरना तब भी वह त्योरी डालकर कह सकता था, “तुम्हें खुद ही अपने-आप की शरम नहीं, तो दूसरा कोई तुमसे क्या कह सकता है ? तुम्हें अच्छा लगता है अपने को उघाड़कर दिखाना, तो ठीक है... दिखाती रहा करो। मैं आगे से तुमसे इस बारे में कुछ कहूँगा भी नहीं।”
‘तोषी’ की ज़िन्दगी सब ओर से कटी हुई है क्यूंकि ‘जुगल’ को लोग पसंद नहीं। और उसे पसंद नहीं, तो ‘तोषी’ का नितांत अकेलापन एक ही आदमी की उपस्थिति और अनुपस्थिति के बीच ख़ुद को दोहराता है।
शाम को उसके घर आने से लेकर सुबह दफ़्तर जाने तक वह दोपहर के इस एकान्त की राह देखती थी। पर दोपहर के अकेलेपन की खीझ इसे सुबह-शाम की झुंझलाहट से कहीं ज़्यादा छा लेने वाली लगती थी।
कहानी ‘सीमाएं’ में ‘उमा’ एक ऐसी लड़की है जिसे अपना शरीर पसंद नहीं। उसके सारे विचार और अनुभव इस एक बात के इर्द गिर्द घूमते रहते हैं। उसे अपनी सहेलियों को हँसते देखकर लगता है कि कहीं वे उसका मज़ाक तो नहीं उड़ा रहीं। वो बाहर भी जाती है तो सकुचाती है, लोगों से कटी हुई रहती है। केवल एक विचार उसका साये की तरह साथ रहता है।
पफ रखकर जब उसने चेहरे को हाथ से मलना आरम्भ किया तभी सीढ़ियों पर पैरों की खट्-खट् सुनाई दी। इससे पहले कि वह तौलिये में मुँह छिपा पाती, रक्षा दरवाजा खोलकर कमरे में आ गयी। उमा के लिए अपना आप भारी हो गया।
“तैयार हो गयी, परी रानी?” रक्षा ने मुस्कुराकर पूछा।
परी रानी शब्द उमा को खटक गया। उसे लगा कि उस शब्द में चुभती हुई चोट है।
“साढे पाँच बज गये ?” उसने कुण्ठित स्वर में पूछा।
इन तीनो कहानियों में राकेश ने अपने युग के स्त्री चरित्रों को जीवंत कर दिया है। वे सभी एक पुरुष केंद्रित समाज में रहती हैं लेकिन उसके प्रति उनकी आंतरिक वास्तविकताएं और प्रतिक्रियाएँ भिन्न हैं। अकेली, स्वतंत्र और कलाप्रेमी ‘मिस पाल’ अपने दफ्तर के लोगों की हर दिन की फब्तियों से थककर इस्तीफ़ा दे देती हैं अपने लिए एक नई ज़िंदगी ढूँढते दिल्ली से देहरादून आ जाती है जहाँ उन्हें फिर से उसी तरह की फब्तियों का सामना करना पड़ता है। ‘तोषी’ के अस्तित्व को उसके पति ने इस तरह से जकड़ रखा है कि वो अगर सोचती भी है कि उठे और घर छोड़कर चली जाये तो वो रुक जाती है कि कहीं ‘जुगल’ इस बात से खुश ना हो जाए। उमा को बाहर की दुनिया चिढ़ाती हुई सी मालूम होती है जहाँ उसे अपना पूरा अस्तित्व अनाकर्षक लगता है।
राकेश की कहानियों में ग़मगीन आशिक़ भी हैं जो शराब में डूबकर अपना ग़म ग़लत करते हैं। कई कहानियों में प्रेम और उसके अधिकार भाव का आधार केवल इतना ही है कि दो लोगों का कुछ बार साथ बैठ कर बात कर लेना जो की आज के पाठक को अनोखा और अतार्किक लगेगा। और यही अधिकार भाव बार बार घायल होता है। राकेश के विवाहित किरदार और भी उलझे हुए हैं, लगभग एक अंतहीन त्रासदी को जीते हुए। और राकेश ने उनके अंतर्मन का बड़ी सूक्ष्मता से विश्लेषण किया है। कहानी ‘अपरिचित’ ऐसे ही दो लोगों की कहानी है जो एक ट्रेन में मिलते हैं और एक अनजान व्यक्ति से वो सब कहते हैं जो उनके जीवनसाथी के लिए अर्थहीन है।
“मेरी बहुत खराब आदत है,” वह बोली, “मैं बात-बेबात के सोचती रहती हूँ। कभी-कभी तो मुझे लगता है कि मैं सोच-सोचकर पागल हों जाऊँगी। ये मुझसे कहते हैं कि मुझे लोगों से मिलना-जुलना चाहिए, खुलकर हँसना, बात करना चाहिए, मगर इनके सामने मैं ऐसे गुमसुम हो जाती हूँ कि क्या कहूँ? वैसे और लोगों से भी मैं ज़्यादा बात नहीं करती लेकिन इनके सामने तो चुप्पी ऐसी छा जाती है जैसे मुँह में ज़बान हो ही नहीं... अब देखिए न, इस वक्त कैसे लतर-लतर बात कर रही हूँ!” और वह मुस्कुराई। उसके चेहरे पर हल्की-सी संकोच की रेखा आ गयी।
कहानी में हम इन दो किरदारों के नाम नहीं जानते क्यूँकि वे अपना परिचय नहीं देते ( इसलिए शायद कहानी का नाम ‘अपरिचित’ है ) लेकिन उनके दिमागों को कोहरे की तरह घेरे दो और लोगों के नाम हम जानते हैं क्यूँकि पूरे समय ये किरदार उनके बारे में सोचते और बात करते हैं, और शायद अब यही उनका परिचय बन गया है।
मैं जानता था कि वह कोई भी बात मुझसे नहीं कह रही-वह अपने से बात करना चाहती है और मेरी मौजूदगी उसके लिए सिर्फ़ एक बहाना है। मेरी उदासी भी उसके लिए न होकर अपने लिए थी, क्योंकि बात उससे करते हुए भी मुख्य रूप से मैं सोच अपने विषय में रहा था। मैं पाँच साल से मंजिल-दर-मंजिल विवाहित जीवन से गुजरता आ रहा था- रोज यही सोचते हुए कि शायद आनेवाला कल ज़िन्दगी के इस ढाँचे को बदल देगा। सतह पर हर चीज़ ठीक थी, कहीं कुछ गलत नहीं था, मगर सतह से नीचे जीवन कितनी-कितनी उलझनों और गाँठों से भरा था!
दोनों ही पात्र अपनी जीवन को एक सरलता, उन्मुक्तता, और गहराई से जीना चाहते हैं न कि एक थोपी हुई कृत्रिमता से। अगर ये महेश भट्ट की कोई घटिया फ़िल्म होती, तो हम कल्पना कर सकते हैं कि कहानी किधर जाती।1 लेकिन कहानी कहीं भी नहीं जाती क्योंकि एक औसत कामचलाऊ ठहराव पर अटकी ज़िन्दगी अक्सर कहीं भी नहीं जाती।
“आपको शायद खुशी हो रही है कि पागल होने की उम्मीदवार आप अकेली ही नहीं हैं,” मैंने मुस्कुराकर कहा। वह भी मुस्कुराई। उसकी आँखें सहसा भावनापूर्ण हो उठीं। उस एक क्षण में मुझे उन आँखों में न जाने कितना-कुछ दिखायी दिया-करुणा, क्षोभ, ममता, आर्द्रता, ग्लानि, भय, असमंजस और स्नेह ! उसके होंठ कुछ कहने के लिए काँपे, लेकिन काँपकर ही रह गये। मैं भी चुपचाप उसे देखता रहा। कुछ क्षणों के लिए मुझे महसूस हुआ कि मेरा दिमाग बिलकुल खाली है और मुझे पता नहीं कि मैं क्या कर रहा हूँ और आगे क्या कहना चाहता था। सहसा उसकी आँखों में फिर वही सूनापन भरने लगा और क्षण-भर में ही वह इतना बढ़ गया कि मैंने उसकी तरफ़ से आँखें हटा लीं।
और शादीशुदा चेहरों का ये स्थायी अनजानापन बार-बार कई कहानियों में उभरता है। कहीं पीड़ा में, कहीं हास्य में। राकेश ने अपने जीवन में तीन बार शादी की जिनमें से पहली दो का अंत तलाक में हुआ। ज़ाहिर है कि उन अनुभवों का दंश उनकी कहानियों में भी नज़र आए। ‘एक और ज़िन्दगी’ कहानी में एक तलाकशुदा पिता अपने बच्चे को लेकर किंकर्तव्यविमूढ़ है। वह उससे प्रेम भी करना चाहता है और सब कुछ पीछे छोड़कर एक नए जीवन की शुरुआत भी।
ब्याह के कुछ महीने बाद से ही पति-पत्नी अलग रहने लगे थे। ब्याह के साथ जो सूत्र जुड़ना चाहिए था, वह जुड़ नहीं सका था। दोनों अलग-अलग जगह काम करते थे और अपना-अपना स्वतन्त्र ताना-बाना बुनकर जी रहे थे। लोकाचार के नाते साल-छः महीने में कभी एक बार मिल लिया करते थे। वह लोकाचार ही इस बच्चे को दुनिया में ले आया था...
बीना समझती थी कि इस तरह जान-बूझकर उसे फँसा दिया गया है। प्रकाश सोचता था कि अनजाने में ही उससे एक कसूर हो गया है।
‘गुंझल’ एक ऐसे अजनबी हो चुके पति पत्नी की कहानी है जो एक अंतहीन से लगने वाले बस के सफ़र पर साथ हैं, लेकिन शरीर से शरीर भी नहीं छूने देना चाहते। इस संकलन की संभवतः सर्वश्रेष्ठ कहानी में राकेश ने इस यात्रा में दोनों व्यक्तियों के आंतरिक और पारसपरिक अंतर्विरोध का वर्णन किया है। दोनों ही एक निश्चितता की ओर बढ़ चले हैं लेकिन अलग अलग रास्तों से, और उनके मिलने की कोई संभवाना इस कहानी में नहीं है। कहानी में तनाव इतना अधिक है कि पाठक अनुभव कर सकता है जैसे ये उसके साथ घटित हो रहा हो। विषाद, कड़वाहट, झुंझलाहट, सब एक साथ संवाद में झलकते हैं —
कुन्तल की भौंहें कुछ खिंच गयीं और नाक जरा जरा काँपने लगी। उसकी सलाइयाँ भी पहले से तेज-तेज चलने लगीं। मगर उसने कहा कुछ नहीं, सिर्फ़ अपनी आँखें हटाकर दूसरी तरफ देखने लगी।
“इसलिए मैं चाहता हूँ कि तुम्हारे जाने से पहले बात बिलकुल साफ़ कर ली जाये। कोई भी इन्सान अपना पूरा जीवन इस तरह दुविधा में रहकर नहीं काट सकता। तुम आगे के लिए अपने मन में क्या सोचती और चाहती हो, यह तुम मुझसे साफ़-साफ़ कह सकती हो।”
“हम आगे के लिए न तो कुछ सोचते हैं, और न ही कुछ चाहते हैं।”
राकेश की कहानियाँ शहरी मध्यम वर्गीय जीवन के आस पास घूमती हैं जहाँ छोटे कमरों में रहने वाली जिंदगियों की छटपटाहट है, आस पास के चेहरों से एक सतत कुढ़न है, और सालों साल सड़ते हुए अस्तित्व में कुछ भी न बदल पाने की घोर निराशा भी। और एक सवाल, “अगर यूँ होता तो क्या होता” — ‘व्हाट इफ’। लेकिन अक्सर इन कहानियों के किरदारों में उतना साहस और निश्चय नहीं है कि वो कुछ बदल सकें। वे केवल आहें भरते हैं और अंतर्विरोध में जीते हैं। चाहे वे बेरोजगार युवा हों या नौकरीपेशा गृहस्थ। हाँ उनके भीतर का इकट्ठा होता क्रोध और तड़प का ज्वालामुखी रहरहकर फट पड़ता है — कभी ख़ुद पर और कभी दूसरों पर। ‘सुहागिनें, ‘आदमी और दीवार’, ‘पाँचवे माले का फ़्लैट’ ऐसी शानदार कहानियाँ है जिनमें किरदारों का अंतर्द्वंद्व उनसे कुछ भी नहीं कराता लेकिन उन्हें उलझाये रखता है।
लौटकर कुर्सी पर आ गया। कितनी ही देर बैठा रहा। फिर एकाएक उठकर किताब को हाथ में ले लिया। फिर वहीं रख दिया। अन्दर जाकर छुरी ले आया और डबल रोटी के स्लाइस काटने लगा। फिर आधे कटे स्लाइस को वैसे ही छोड़कर खिड़की के पास चला गया। वहाँ से, जैसे उसकी नजर से, कितनी देर, कितनी ही देर, अपने को और अपने कमरे को देखता रहा, देखता रहा।
राकेश की कहानियों में समाज के हर वर्ग के लोग मौजूद हैं हैं: तांगे वाले, चपरासी, दुकानदार, जेबकतरे, मवाली, बेरोजगार, इंटेलेक्चुअल, शराबी, वेश्याएँ, जुवारी, बस ड्राइवर, विभाजन के बाद के शरणार्थी कैंपों में रहने वाले लोग। ये सभी राकेश की कहानियों में अपने पूरे व्यक्तित्व के साथ दर्ज हैं। बहुत समय बाद मैंने हिंदी में कुछ पढ़ा और मुझे ये कहानियाँ बहुत रुचीं। शायद राकेश का उपन्यास ‘न आने वाला कल’ और ‘अंधेरे बंद कमरे’ कभी पढ़ा जाये!
फ़िल्मों की बात चली, तो इसी विषयवस्तु पर बनी, वोंग कार-वाई की 1962 की फ़िल्म ‘इन द मूड फॉर लव’ एक शानदार अभिव्यक्ति है


