ठहरा है चुपचाप जहां जब आज इस रात
लड़खड़ाते फिर रहे कहाँ आप इस रात
रंगीन चकाचौंध में मदहोश लोग हैं अंदर
बाहर खड़ा इक शख़्स निहारता है चाँद इस रात
उम्र भर चेहरों के दरमियाँ इक शख़्स की तलाश कर
आखिर में खोजते हैं उसे अल्फ़ाज़ों के दरमियाँ इस रात
वो सौदे जिनसे किए उनसे तो न की कोई कवायद
ये क्या कि मेरे गिरेबां पे बढ़े आपके हाथ इस रात
इमारत की खिड़कियों से झांकते बेताब क्यों ये लोग
क्या देखते हैं, रोशनी क्यों नहीं बुझा देते हैं इस रात
उस रात कितने बे-सुकून थे जो तुम नहीं मिले
तुम नहीं मिले यही सुकून हमें आज है इस रात


